Short Hindi Stories with Moral values महर्षि दुर्वासा माता अनुसुइया और ऋषि अत्री के पुत्र थे. महर्षि दुर्वासा सतयुग, द्वापर और त्रेता तीनो ही युगों में थे.

 

 

 

उनके दिए हुए श्राप और आशीर्वाद से कई घटनाएं हुई, जो की बड़े परिवर्तन का कारण बनी.  Durvasa Rishi Ka Shraap कई बड़े परिवर्तन का कारण बना .

 

 

 

Short Hindi Stories with Moral values For Class 5

 

 

 

Durvasa Rishi Ka Krodh बहुत प्रबल था .    क्रोध में अक्सर वह श्राप दे देते थे. लेकिन अगर वह किसी पर प्रसन्न होते थे तो उसकी हर मनोकामना को पूरा करते थे.

 

 

 

 

उनके क्रोध के कारण हर कोई उनसे डरता था. ऋषि दुर्वाषा माता अनुसुइया के पुत्र हैं. उन्हें सती अनसूया ने भगवान शंकर के आशीर्वाद से प्राप्त किया था. महर्षि दुर्वासा का आश्रम उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में है.

 

 

 

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माता अनुसुइया और उनके पति अत्री दुर्वाषा जी के इस व्यवहार से बहुत ही चिंतित और दुखी थे. दुर्वासा जी का जन्म सतयुग के प्रारंभ में ही हुआ था.

 

 

 

 

एक बार की बात है।  इक्ष्वाकु वंश के एक राजा थे अम्बरीश. अम्बरीष बहुत ही दयालु और न्यायप्रिय राजा थे. उनके शासन में प्रजा बहुत ही खुश थी. वे प्रजा के हर सुख दुःख का ख्याल रखते थे. इसके साथ ही राजा अम्बरीश भगवान श्री हरी के परम भक्त थे.

 

 

 

 

उनकी भक्ति से भगवान नारायण बहुत अधिक प्रसन्न हुए और अपने sudarshan chakra का नियंत्रण राजा अम्बरीश के हाथ में सौंप दिया. यह भी भगवान की एक लीला थी. भगवान के प्रत्येक कार्य में भविष्य का सार छुपा होता है.

 

 

 

 

एक बार की बात है राजा अम्बरीश और उनकी धर्मपत्नी ने एकादसी का व्रत किया और उस व्रत के पारण में ब्राह्मणों को भोजन के लिये आमंत्रित किया गया था और उस निमंत्रण में महर्षि दुर्वासा भी आये थे.

 

 

 

 

भोजन करने के पहले महर्षि दुर्वासा यमुना जी में स्नान करने चले गए. इधर बहुत देर तक इन्तजार करने के बाद राजा अम्बरीश ने अन्य ब्राह्मणों से इस बारे में पूछा तो ब्राह्मणों ने कहा कि राजान आप पानी पी लीजिये या खाना खाने और ना खाने के बराबर होगा. ब्राह्मणों की बात मानकर राजा ने ऐसा ही किया.

 

 

 

 

जब राजा ने व्रत खोल लिया तो उसके कुछ देर बाद महर्षि दुर्वासा वहाँ आ पहुँछे और यह देख कि राजा ने उनके अनुपस्थिति में ही व्रत खोल लिया है बहुत क्रोधित हुए और क्रोध में उन्होंने कृत्या राक्षसी की रचना की और उसे राजा अम्बरिश पर आक्रमण का आदेश दे दिया.

 

 

 

 

अपने बचाव के लिए  राजा अम्बरीश ने sudarshan chakra का आह्वान किया और उसी क्षण सुदर्शन प्रकट हुआ और कृत्या राक्षसी का वध कर दिया और उसके बाद वह दुर्वासा ऋषि की तरफ बढ़ा.

 

 

 

 

अब durvasa अपने प्राण बचाने के लिए इधर उधर भागने लगे…भागते भागते वे इंद्र देव के पास पहुंचे और अपने प्राण बचाने की गुहार लगाईं, लेकिन इन्द्रदेव ने इसमे अपनी असमर्थता जताते हुए उन्हें भगवान ब्रह्मा के पास भेज दिया. भगवान ब्रह्मदेव ने भी इसमे असमर्थता जताई और उन्हें भगवान भोलेनाथ के पास भेज दिया और बाबा भोले ने उन्हें भगवान विष्णु के पास भेज दिया.

 

 

 

 

भगवान विष्णु के पास पहुँचने पर महर्षि दुर्वासा ने पूरी बात बताई. तब भगवान विष्णु ने कहा की हर जगह क्रोध ठीक नहीं होता है. इसमें मैं भी कुछ करने में असमर्थ हूँ क्योंकि इस समय सुदर्शन चक्र का नियंत्रण राजा अम्बरीश के पास है अतः आपको वहीँ जाना होगा.

 

 

 

 

दुर्वासा जी को अपनी भूल का एहसास हो चुका था. वे तुरंत ही राजा के पास पहुंचे और सारी बात बताते हुए सुदर्शन को रोकने को कहा, तब राजा ने तुरंत ही सुदर्शन को रोक दिया.

 

 

 

 

Moral – हिन्दू धर्म की कथाओं में हमेशा कोई ना कोई सार छुपा होता है।  इस घटना से यही शिक्षा मिलती है कि बिना सोचे – समझे कभी क्रोध नहीं करना चाहिए। 

 

 

 

2- Short Hindi Stories with Moral values For Class 3 अकबर को मजाक की आदत थी. एक बार उन्होंने नगर के सेठों को आदेश दिया की अब से तुम लोगों को नगर की पहरेदारी करनी होगी. अब सेठ बड़े चक्कर में पड़ गए और भागे-भागे बीरबल के पास आये और सारी बात कह सुनाई.

 

 

 

 

बीरबल ने कहा कोई बात नहीं अब जैसा कहता हूँ वैसा ही करो. तुम सभी लोग अपनी पगड़ियों को पैर में और पायजामें को सर पर लपेटकर पुरे नगर में चिल्ला-चिल्लाकर कहो “अब तो आन पड़ी है”.

 

 

 

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रात को अकबर भेष बदलकर राज्य के निरिक्षण के लिए निकले तो सेठों का यह निराला रूप देख पहले तो खूब हँसे और फिर बोले ” यह सब क्या है”?

 

 

 

 

सेठों के मुखिया ने कहा “हम सब व्यापारी है. हमें इसके बारे में क्या पता? पता होता तो हमें बनिया क्यों कहा जाता? झो जिसका काम होता है वही उसे अच्छे से कर सकता है.” अकबर को बात समझ में आ गयी और उन्होंने अगले ही दिन हुक्म वापस ले लिया

 

 

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3- किसी समय बीरबल ने अकबर को एक कहावत सुनाई थी की ” खाकर लेटना और मारकर भाग जाना ” सयाने लोगो की पहचान है. एक दिन महाराज को दोपहर में यह कहावत याद आ गयी.

 

 

 

बीरबल जरुर खाना खाने के बाद लेटता होगा. क्यों ना आज उसकी बात को गलत सिद्ध किया जाए. अकबर ने एक नौकर को बीरबल के पास भेजा और तुरंत आने को कहा. बीरबल सारा माजरा समझ गए.

 

 

 

उन्होंने नौकर को कहा रुको मैं कपडे बदल कर आता हु.. उन्होंने उस दिन चुस्त पायजामा चुना और पायजामा पहनने के बहाने वह बिस्तर पर लेट गए और काफी देर तक लेते रहे.

 

 

 

दरबार पहुंचाते ही अकबर बोले, बीरबल आज खाना खाने के बाद लेते की नहीं. बिलकुल लेटा था महाराज.इसका मतलब तुमने मेरे आदेश की अवहेलना की है. तुम्हे इसका दंड मिलेगा. इसपर बीरबल बोले, महाराज! मैंने कोई हुक्म उदूली नहीं की है.

 

 

 

 

मैं तो खाना खाने के बाद कपड़े पहनकर सीधा आपके पास ही आ रहा हूं.  आप तो पैगाम ले जाने वाले से पूछ सकते हैं.  अब ये अलग बात है कि ये चुस्त पाजामा पहनने के लिए ही मुझे लेटना पड़ा था. ” बीरबल ने सहज भाव से उत्तर दिया. अकबर बादशाह बीरबल की चतुरता को समझ गए और मुस्करा पड़े.

 

 

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