New Moral Stories in Hindi 2020 / कैसे ख़त्म हुआ विश्वामित्र जी का अहंकार

New Moral Stories in Hindi मिथिला में वहाँ  राजपुरोहित शतानंद जी भगवान से बहुत प्रभावित हुए।  उन्होंने कहा, ” हे राम ! आप बहुत सौभाग्यशाली हैं कि आपको विश्वामित्र जैसे गुरु मिले।  वे महान प्रतापी और तेजस्वी महापुरुष हैं।  ”

 

 

 

उनके इस बात पर प्रभु श्रीराम विश्वामित्र जी के बारे में और अधिक जानने की जिज्ञासा  प्रकट की।  इस पर शतानंद जी विश्वामित्र जी के बारे में विस्तार से बताना शुरू किया।

 

 

 

उन्होंने कहा ब्राह्मणत्व की प्राप्तिके पूर्व ऋषि विश्वामित्र बड़े ही पराक्रमी और प्रजावत्सल राजा थे।  प्रजापति के पुत्र कुश, कुश के पुत्र कुशनाभ और कुशनाभ के पुत्र राजा गाधि थे।

 

 

 

New Moral Stories in Hindi Written कैसे ख़त्म हुआ विश्वामित्र जी का अहंकार

 

 

 

 

ये सभी महान पराक्रमी और शूरवीर थे।  Vishwamitra Ji उन्ही महान पराक्रमी गाधि के पुत्र हैं।  एक बार की बात है विश्वामित्र अपनी सेना सहित ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के आश्रम में गए।

 

 

 

उस समय ब्रह्मर्षि  वशिष्ठ यज्ञ कर रहे थे।  विश्वामित्र जी उन्हें प्रणाम कर वहीँ बैठ गए।  यज्ञ क्रिया से निवृत्त होने के पश्चात वशिष्ठ जी ने विश्वामित्र जी का बहुत आदर सत्कार किया और कुछ दिन आश्रम में रह कर आतिथ्य ग्रहण करने का अनुरोध किया।

 

 

 

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इस पर विश्वामित्र ने यह सोचकर कि इतनी विशाल सेना के साथ यहां रुकने से वशिष्ठ जी को कष्ट होगा, इसलिए उन्होंने नम्रतापूर्वक वशिष्ठ जी से विदा होने की अनुमति मांगी।

 

 

 

किन्तु वशिष्ठ जी के अत्यधिक अनुरोध करने पर थोड़े दिनों के लिये राजा विश्वामित्र को उनका आतिथ्य स्वीकार करने के लिए विवश होना पड़ा।

 

 

 

राजा विश्वामित्र के आतिथ्य स्वीकार कर लेने पर ब्रह्मर्षि वशिष्ठ जी ने कामधेनु गौ से विश्वामित्र और उनकी सेना के लिए छह प्रकार के व्यंजन तथा समस्त प्रकार की सुविधाओं की व्यवस्था करने की प्रार्थना की।

 

 

 

उनकी इस प्रार्थना को स्वीकार करके कामधेनु गौ ने सारी व्यवस्था कर दिया। वशिष्ठ जी के अतिथि सत्कार से राजा विश्वामित्र और उनके साथ आये सभी लोग बहुत प्रसन्न हुये।

 

 

 

कामधेनु गौ का चमत्कार देखकर विश्वामित्र जी के मन में लालच हो गैया।  उन्होंने कहा, ” ऋषिश्रेष्ठ ! गामधेनु गौ किसी वनवासी नहीं वरन राजा महाराजाओं के पास शोभा देती है।  अतः आप इसे मुझे  दे दीजिये।  इसके बदले आपको मैं सहस्त्रों स्वर्ण मुद्राएं दे सकता हूँ।  ”

 

 

 

 

इस पर वशिष्ठ जी ने कहा, ” राजन ! यह गौ ही मेरा जीवन है और इसे मैं किसी भी कीमत पर नहीं दे सकता हूँ। ” वशिष्ठ जी के इस प्रकार कहने पर विश्वामित्र जी जबरदस्ती कामधेनु गाय को ले जाने का आदेश सैनिकों को दे दिया।

 

 

 

 

इससे क्रोधित होकर वशिष्ठ जी के कहने पर कामधेनु ने  योगबल से पह्नव सैनिकों की एक सेना उत्पन्न कर दिया और वह सेना विश्वामित्र की सेना के साथ युद्ध करने लगी।

 

 

 

 

विश्वामित्र जी ने अपने पराक्रम से समस्त पह्नव सेना का विनाश कर डाला। इस पर कामधेनु ने सहस्त्रों शक, हूण, बर्वर, यवन और काम्बोज सैनिक उत्पन्न कर दिया।

 

 

हिंदी की कहानी 

 

 

 

जब विश्वामित्र ने उन सैनिकों का भी वध कर डाला तो कामधेनु ने मारक शस्त्रास्त्रों से युक्त अत्यंत पराक्रमी योद्धाओं को उत्पन्न किया जिन्होंने शीघ्र ही राजा विश्वामित्र की सेना को गाजर मूली की भाँति काटना आरम्भ कर दिया।

 

 

 

अपनी सेना को इस तरह नष्ट होते देखकर विश्वामित्र के सौ पुत्र अत्यंत क्रोधित होकर वशिष्ठ जी को मारने दौड़े।  वशिष्ठ जी ने उसमें से एक को बाकी सभी को योगबल से भस्म कर दिया।

 

 

 

सेना तथा पुत्रों के नष्ट हो जाने से विश्वामित्र जी बड़े दुखी हुए। अपने बचे हुए पुत्र का राजतिलक कर वे तपस्या करने के लिए हिमालय चले गए।  वहाँ   उन्होंने  भगवान शिव की घोर तपस्या की।

 

 

 

उन्होंने महादेव से तमाम  दिव्य शक्तियों का ज्ञान प्राप्त किया और उसके बाद वे सीधा वशिष्ठ जी के आश्रम पहुंचे और उन्हें  युद्ध के लिए ललकारते हुए अग्निबाण चला दिया।

 

 

 

अग्निबाण से पुरे आश्रम में आग लग गयी और आश्रमवासी भयभीत होकर इधर – उधर भागने लगे।  यह देखकर वशिष्ठ जी भी  क्रोधित होकर युद्ध करने लगे।

 

 

 

क्रुद्ध होकर विश्वामित्र ने एक के बाद एक आग्नेयास्त्र, वरुणास्त्र, रुद्रास्त्र  को एक साथ छोड़ा जिन्हें वशिष्ठ जी ने अपने मारक शक्तियों  से मार्ग में ही नष्ट कर दिया।

 

 

 

इस पर विश्वामित्र ने और भी अधिक क्रोधित होकर मानव, मोहन, गान्धर्व, जूंभण, दारण, वज्र, ब्रह्मपाश, कालपाश, वरुणपाश, पिनाक, दण्ड, पैशाच, क्रौंच, धर्मचक्र, कालचक्र, विष्णुचक्र, वायव्य, मंथन, कंकाल, मूसल, विद्याधर, कालास्त्र आदि का प्रयोग कर डाला।

 

 

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वशिष्ठ जी ने उन सबको नष्ट करके ब्रह्मास्त्र छोड़ने के लिये जब अपना धनुष उठाया तो सब देव किन्नर आदि भयभीत हो गये। किन्तु वशिष्ठ जी तो उस समय अत्यन्त क्रुद्ध हो रहे थे। उन्होंने ब्रह्मास्त्र छोड़ ही दिया।

 

 

 

ब्रह्मास्त्र के भयंकर अग्नि और नाद से सारे संसार में त्राहिमाम मच गया।  सभी ऋषि – मुनि उनसे प्रार्थना करने लगे।  इस प्रार्थना से द्रवित होकर और लोगों के कल्याण हेतु ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने ब्रह्मास्त्र को वापस बुला लिया।

 

 

 

वशिष्ठ जी के तेज के सम्मुख नहीं टिकने पर विश्वामित्र जी दृढ संकल्प लिया कि वे ब्राह्मणत्व को प्राप्त अवश्य करेंगे और महर्षि कहलायेंगे।  इस प्रकार विचार करके वे अपनी पत्नीसहित दक्षिण दिशा की ओर चल दिये।

 

 

 

उन्होंने तपस्या करते हुए अन्न जल का त्याग करते हुए फलों पर जीवन – यापन करना शुरू किया।  उन्होंने कठोर तप किया।  उनके इस तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें राजर्षि का पद दिया, लेकिन विश्वामित्र जी तो  ब्रह्मर्षि का पद चाहते थे।

 

 

 

इसपर ब्रह्मदेव ने कहा ब्रह्मर्षि  का पद तो केवल ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ही दे सकते हैं। इस पर विश्वामित्र जी और अधिक तपस्या करने लगे।  उनकी तपस्या से दिग – दिगंत काम उठे, लेकिन उन्हें फिर भी वैसी सफलता नहीं मिली।

 

 

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इस पर विश्वामित्र जी ने सोचा जरूर इसमें वशिष्ठ जी का कोई छल है।  वही जानबूझ कर ब्रह्मर्षि का पद नहीं देना चाहते हैं।  यह सोचकर विश्वामित्र जी के मन में अत्यंत क्रोध उत्पन्न हुआ।

 

 

 

वशिष्ठ जी का वध करने का निश्चय कर वे उनके आश्रम पहुंचे।  उन्होंने देखा कि चाँदनी रात में वशिष्ठ जी अपने शिष्यों  संग चर्चा कर रहे थे।  विश्वामित्र जी वहीँ छुप गए।

 

 

 

 

तभी एक शिष्य ने ब्रह्मर्षि वशिष्ठ से पूछा, ” भगवन ! स्वच्छ आकाश में प्रकाश फैला रहे शीतल चाँद को देखकर आपके मन में क्या विचार आ रहे हैं ? ”

 

 

 

तब ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने कहा, ” चाँद वैसे ही पुरे संसार को प्रकाशित कर रहा है जैसे विश्वामित्र का यश।  ” यह सुनकर विश्वामित्र को बड़ा आश्चर्य हुआ।  उनके मन के सारे अवगुण नष्ट होते गए।  वे वशिष्ठ जी चरणों गिर पड़े।

 

 

 

वशिष्ठ जी ने उन्हें उठाते हुए कहा, ” उठो ब्रह्मर्षि ”  . यह सुनते ही विश्वामित्र सहित समस्त सृष्टि चौंक पड़ी।  इस  पर वशिष्ठ जी ने कहा, ” आप हर से इस पद के योग्य थे।  बस आपके मन में पद की लालसा और अहंकार था, जो कि आज ख़त्म हो गया।  ” इस तरह से विश्वामित्र जी ने ब्रह्मर्षि का पद पाया।

 

 

 

Moral –  इस कथा से  हमें यह सीख मिलती है कि जब तक मन में अहंकार होता है आप  सर्वश्रेष्ठ कभी नहीं बन सकते।  इसलिए कभी भी अहंकारी नहीं होना चाहिए। 

 

 

 

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2-  एक जंगल में एक बहुत ही विशाल पेड़ था. उस पेड़ पर बहुत सारे हंस रहते थे. उसमें एक हंस जो कि सबसे उम्रदराज था वह बहुत ही तेज दिमाग वाला और दूरदर्शी था. सभी हंस उसकी बहुत इज्ज़त करते थे.

 

 

 

एक उसने देखा कि एक नन्हीं सी बेल पेड़ से लिपट रही है. उसने अन्य हंसों से कहा कि इस बेल को दूर कर दो नहीं तो यह कभी भारी मुसीबत लाएगी. इस पर एक युवा हंस बड़े ही जोश से बोला” अरे यह छोटी सी बेल हमारा क्यया बिगाड़ेगी. आप झूठे ही परेशान हो रहे हैं”

 

 

 

 

दूरदर्शी हंस ने उसे समझाया, ” बेटा हमने दुनिया देखी है. तुम अभी छोटे हो. तुम्हें इन सब का ज्ञान नहीं है. छोटी सी मुसीबत कल को बड़ी बन जाती है. हब यह बेल काफी बड़ी होकर और भी  मजबूती से पेड़ को लपेट लेगी तो यह सीढ़ी का काम करेगी और कोई भी इस पेड़ पर आ जाएगा”.

 

 

 

 

युवा हंस को बड़ा ही बुरा लगा. वह बोला आप खाली अपनी बात मनवाने की कोशिश कर रहे हो बस. ऐसा कुछ नहीं होता है. “ठीक है भाई. अगर तुम्हे यही लगता तो जाने दो” दूरदर्शी हंस बोला

 

 

 

समय बीता और समय के साथ ही बेल मजबूती से पेड़ को लपेटने लगी. अब बाकी हंसों को इसकी चिंता होने लगी. उन्हें अपने किये पर पछतावा हो रहा था. अगर वे उसी दिन हंस की बात मां लेते तो ऐसा नहीं होता.लेकिन अब तो तीर कमान से निकल चुका था.

 

 

 

एक दिन जब हंस दाना चुगने गए तो एक बहेलिया आया और उसने पेड़ पर अपना जाल बिछा दिया. वह कई दिनों से उस पेड़ पर नजर रख रहा था. शाम को जब हंस वापस लौटे तो जाल में फंस गए और छटपटाने लगे.

 

 

 

दूरदर्शी हंस चुपचाप बैठा था. वह भी इन मुर्ख हंसों की वजह से फंस गया था. दुसरे हंस अपने किये पर शर्मिन्दा थे. एक ने उस दूरदर्शी हंस से बोला, ” हम अपने किये पर शर्मिन्दा हैं और माफ़ी माँगते हैं. अब आप ही हमें बचा सकते हो”.

 

 

 

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दुसरे हंस भी मांफी माँगने लगे. वह युवा हंस रोने लगा. तब दूरदर्शी हंस बोला,” ठीक है. सभी मेरी को ध्यान से सुनो. जैसे ही बहेलिया आयेगा सभी लोग मरने का नाटक करना. बहेलिया एक एक हंस को जाल से बाहर आएगा. लेकिन तब तक कोई नहीं उड़ेगा जब तक आखिरी हंस बाहर ना आ जाए. जैसे ही आखिरी हंस बाहर आएगा मैं इशारा करूंगा और सभी लोग उड़ जाना”.

 

 

 

सुबह बहेलिया आया. हंसों ने ठीक वैसा ही किया. बहेलिया हंसों को मरा हुआ समझ जमीं पर रखने लगा. जैसे ही अंतिम हंस को बहेलिया जमीन पर रखा वैसे ही दूरदर्शी हंस इशारा किया और सभी हंस एक साथ उड़ निकले. बहेलिया हाथ मलता रह गया.

 

 

 

सीख:- छोटी मुसीबत ही बड़ी होती है. उसे छोटे पर ही ख़त्म कर देना चाहिए. 

 

 

 

 

मित्रों यह New Moral Stories in Hindi 2019 है।  इसमें दो बेहद ही शिक्षाप्रद कहानी दी गयी है।  New Moral Stories in Hindi 2018 की तरह की दूसरी कहानी नीचे की लिंक पर पढ़ें और इस कहानी  को शेयर भी जरूर करें।

 

 

 

 

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