moral story in hindi

moral story for kids in hindi

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Written by MoralAbhi

moral story for kids in hindi अपने सैकड़ों रिश्तेदारों के साथ किसी वन में एक मुर्गा रहता था. अन्य मुर्गों से वह कहीं ज्यादा बड़ा और हृष्ट-पुष्ट भी था। उसी वन में एक जंगली बिल्ली रहती थी.

 

उसने मुर्गे के कई रिश्तेदारों को मार कर चट कर लिया था. उसकी नज़र अब उस मोटे मुर्गे पर थी. अनेक यत्न करने पर भी वह उसे पकड़ नहीं पाती थी. अँतत: उस ने जुगत लगाई और एक दिन उस पेड़ के नीचे पहुँची जिसके ऊपर वह मुर्गा बैठा हुआ था.

 

बिल्ली ने कहा, ” हे मुर्गे ! मैं तुमसे प्यार करती हूँ. तुम्हारी सुन्दरता पर मुग्ध हूँ. तुम्हारे पंख और कलगी बडे आकर्षक हैं. मुझे तुम अपनी पत्नी स्वीकार करो और तत्काल नीचे आ जाओ, ताकि मैं तुम्हारी सेवा कर सकूँ.

मुर्गा बड़ा बुद्धिमान् था .उसने कहा :- बिल्ली तुम्हारे पास चार पैर हैं …..मेरे पास दो पैर हैं .  तुम अपने लिए कोई दूसरा वर ढूढ़ लो . क्योंकि पक्षी और जानवर कभी एक नहीं होते .

बिल्ली ने मुर्गे को जब फिर से फुसलाना चाहा तो मुर्गे ने उससे कहा, ओ बिल्ली तूने मेरे रिश्तेदारों का खून पिया है.  मेरे लिए भी तेरे मन में
कोई दया-भाव नहीं है. तू फिर क्यों  मेरी पत्नी बनने की इच्छा जाहिर कर रही है ?”

मुर्गे के मुख से कटु सत्य को सुनकर और स्वयं के ठुकराये जाने की शर्म से वह बिल्ली उस जगह  से तत्काल प्रस्थान कर गयी, और उस पेड़ के आस-पास फिर कभी भी दिखाई नहीं पड़ी.

 

 

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एक तालाब में एक कछुआ रहता था.  उसी तलाब में दो हंस तैरने के लिए उतरते थे. हंस बहुत हंसमुख और मिलनसार थे. कछुए और उनमें दोस्ती होते  देर न लगी. हंसो को कछुए का धीमे-धीमे चलना और उसका भोलापन बहुत अच्छा लगा.

 

हंस बहुत ज्ञानी भी थे.  वे कछुए को अदभुत बातें बताते. ॠषि-मुनियों की कहानियां सुनाते. हंस तो दूर-दूर तक घूमकर आते थे, इसलिए दूसरी जगहों की अनोखी बातें कछुए को बताते. कछुआ मंत्रमुग्ध होकर उनकी बातें सुनता.

 

बाकी तो सब ठीक था, पर कछुए को बीच में टोका-टाकी करने की बहुत आदत थी. अपने सज्जन स्वभाव के कारण हंस उसकी इस आदत का बुरा नहीं मानते थे. उन तीनों की घनिष्टता बढती गई. दिन गुजरते गए.

 

एक बार बडे जोर का सूखा पड़ा.  बरसात के मौसम में भी एक बूंद पानी नहीं बरसा.  उस तालाब का पानी सूखने लगा. प्राणी मरने लगे, मछलियां तो तडप-तडपकर मर गईं. तालाब का पानी और तेजी से सूखने लगा.

 

एक समय ऐसा भी आया कि तालाब में खाली कीचड रह गया. कछुआ बडे संकट में पड गया. जीवन-मरण का प्रश्न खडा हो गया. वहीं पडा रहता तो कछुए का अंत निश्चित था. हंस अपने मित्र पर आए संकट को दूर करने का उपाय सोचने लगे.

 

वे अपने मित्र कछुए को ढाडस बंधाने का प्रयत्न करते और हिम्म्त न हारने की सलाह देते. हंस केवल झूठा दिलासा नहीं दे रहे थे. वे दूर-दूर तक उडकर समस्या का हल ढूढते.

 

एक दिन लौटकर हंसो ने कहा “मित्र, यहां से पचास कोस दूर एक झील हैं. उसमें काफी पानी हैं तुम वहां मजे से रहोगे.” कछुआ रोनी आवाज में बोला “पचास कोस? इतनी दूर जाने में मुझे महीनों लगेंगे. तब तक तो मैं मर जाऊंगा.”

कछुए की बात भी ठीक थी .हंसो ने अक्ल लडाई और एक तरीका सोच निकाला. वे एक लकडी उठाकर लाए और बोले “मित्र, हम दोनों अपनी चोंच में इस लकडी के सिरे पकडकर एक साथ उडेंगे.

 

तुम इस लकडी को बीच में से मुंह से थामे रहना. इस प्रकार हम उस झील तक तुम्हें पहुंचा देंगे उसके बाद तुम्हें कोई चिन्ता नहीं रहेगी.” उन्होंने चेतावनी दी “पर याद रखना, उडान के दौरान अपना मुंह न खोलना .वरना गिर पडोगे.”

कछुए ने हां में सिर हिलाया. बस, लकडी पकडकर हंस उड चले. उनके बीच में लकडी मुंह दाबे कछुआ. वे एक कस्बे के ऊपर से उड रहे थे कि नीचे खडे लोगों ने आकाश में अदभुत नजारा देखा.

 

सब एक दूसरे को ऊपर आकाश का दॄश्य दिखाने लगे. लोग दौड-दौडकर अपने  छज्जों पर निकल आए. कुछ अपने मकानों की छतों की ओर दौडे. बच्चे बूढ़े, औरतें व जवान सब ऊपर देखने लगे. खूब शोर मचा. कछुए की नजर नीचे उन लोगों पर पडी.

उसे आश्चर्य हुआ कि उन्हें इतने लोग देख रहे हैं. वह अपने मित्रों की चेतावनी भूल गया और चिल्लाया “देखो, कितने लोग हमें देख रहे है!” मुंह के खुलते ही वह नीचे गिर पडा. नीचे उसकी हड्डी-पसली का भी पता नहीं लगा.

सीखः बेमौके मुंह खोलना बहुत महंगा पडता हैं.

 

 

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मुर्ख बन्दर 

 

वाराणसी नरेश के राज-बगीचे में कभी एक माली रहता था. वह दयावान् था और उसने बगीचे में बंदरों को भी शरण दे रखी थी. बंदर उसके कृपापात्र और कृतज्ञ थे.

एक बार वाराणसी में कोई धार्मिक त्यौहार मनाया जा रहा था. वह माली भी सात दिनों के उस जलसे में सम्मिलित होना चाहता था. अत: उसने बंदरों के राजा को अपने पास बुलाया और अपनी अनुपस्थिति में पौधों को पानी देने का आग्रह किया.

 

बंदरों के राजा ने अपनी बात सहर्ष स्वीकार कर ली. जब माली बाग से चला गया तो उसने अपने सारे बंदर साथियों को बुलाकर उनसे पौधों को पानी देने की आज्ञा दी.

 

साथ ही उसने उन्हें यह भी समझाया कि बंदर जाति उस माली की कृतज्ञ है इसलिए वे कम से कम पानी का प्रयोग करें क्योंकि माली ने बड़े ही परिश्रम से पानी जुटाया था.

 

अत: उसने उन्हें सलाह दी कि वे पौधों की जड़ों की गहराई माप कर ही उन पर पानी ड़ाले. बंदरों ने ऐसा ही किया. फलत: पल भर में बंदरों ने सारा बाग ही उजाड़ दिया.

तभी उधर से गुजरते एक बुद्धिमान् राहगीर ने उन्हें ऐसा करते देख टोका और पौधों को बर्बाद न करने की सलाह दी. फिर उसने बुदबुदा कर यह कहा-“जब कि करना चाहता है अच्छाई. मूर्ख कर जाता है सिर्फ बुराई .”

 

 

 मूर्खों को सीख  moral story for kids in hindi

 

एक जंगल में एक पेड पर गौरैया का घोंसला था . एक दिन कडाके की ठंड पड रही थी. ठंड से कांपते हुए तीन चार बंदरो ने उसी पेड के नीचे आश्रय लिया. एक बंदर बोला “कहीं से आग तापने को मिले तो ठंड दूर हो सकती हैं .”

 

दूसरे बंदर ने सुझाया “देखो, यहां कितनी सूखी पत्तियां गिरी पडी हैं. इन्हें इकट्ठा कर हम ढेर लगाते हैं और फिर उसे सुलगाने का उपाय सोचते हैं.”

बंदरों ने सूखी पत्तियों का ढेर बनाया और फिर गोल दायरे में बैठकर सोचने लगे कि ढेर को कैसे सुलगाया जाए. तभी एक बंदर की नजर दूर हवा में उडते एक जुगनू पर पडी और वह उछल पडा.

 

उधर ही दौडता हुआ चिल्लाने लगा “देखो, हवा में चिंगारी उड रही हैं. इसे पकडकर ढेर के नीचे रखकर फूंक मारने से आग सुलग जाएगी.

“हां हां!” कहते हुए बाकी बंदर भी उधर दौडने लगे. पेड पर अपने घोंसले में बैठी गौरैया यह सब देख रही थे. उससे चुप नहीं रहा गया. वह बोली ” बंदर भाइयो, यह चिंगारी नहीं हैं यह तो जुगनू हैं.”

एक बंदर क्रोध से गौरैया को  देखकर गुर्राया “मूर्ख चिडिया, चुपचाप घोंसले में दुबकी रह. हमें सिखाने चली हैं.”

इस बीच एक बंदर उछलकर जुगनू को अपनी हथेलियों के बीच कटोरा बनाकर कैद करने में सफल हो गया. जुगनू को ढेर के नीचे रख दिया गया और सारे बंदर लगे चारों ओर से ढेर में फूंक मारने.

गौरैया ने सलाह दी “भाइयो! आप लोग गलती कर रहें हैं. जुगनू से आग नहीं सुलगेगी .दो पत्थरों को टकराकर उससे चिंगारी पैदा करके आग सुलगाइए.”

बंदरों ने गौरैया को घूरा. आग नहीं सुलगी तो गौरैया फिर बोल उठी “भाइयो! आप मेरी सलाह मानिए, कम से कम दो सूखी लकडियों को आपस में रगडकर देखिए.”

सारे बंदर आग न सुलगा पाने के कारण खीजे हुए थे. एक बंदर क्रोध से भरकर आगे बढा और उसने गौरैया पकडकर जोर से पेड के तने पर मारा. गौरैया फडफडाती हुई नीचे गिरी और मर गई.

सीखः मूर्खों को सीख देने का कोई लाभ नहीं होता. उल्टे सीख देने वाला को ही पछताना पडता हैं.

 

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