Kahaniya Hindi New / सच्चे प्रेम की परिभाषा हिंदी कहानी जरूर पढ़ें

Kahaniya Hindi प्यार को  दूसरों  के समक्ष परिभाषित  कितना कठिन होता है. वैसे भी परिभाषा का अर्थ ही होता है कि बात को इस ढंग इस शैली से रखना की सामने वाले की समझ में आ जाए .      

 

 

 

 

 

रह गयी बात खुद की तो वह खुद को समझ में आ ही चुकी होती है तभी तो परिभाषित करने के लायक बनते  हैं. खैर छोडिये,  प्यार व्यार के बारे में   क्या खयालात हैं.      

 

 

 

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इस असीम सुखद अनुभूति को परिभाषित नहीं किया जा सकता….यह तो तब समझ में आता है जब आप  प्यार की दरिया में कूदते हैं…उसमें तैरते है…उसके हर भाव को अच्छी तरह समझते हैं.      

 

 

 

 

यह बात राधिका को तब समझ आई जब उसकी बेटी जो उम्र के १८ बसंत देख चुकी थी और उम्र के उस पड़ाव पर थी जब बहकने की उम्मीद सबसे ज्यादा होती है एक रोमांटिक सिरिअल को देखते हुए बोली “क्या है यह सब बकवास ….प्यार व्यार सब ढोंग होता है….यह महज एक दिखावा है….यह महज एक शारीरिक रिश्ता ही तो है.”.        

 

 

 

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अपनी बेटी के मुंह प्यार के समर्पण, प्यार के मनोभाव, प्यार की पवित्रता के प्रति इतना द्वेष देख राधिका एकदम से शांत हो गयी. उसने टेलीविजन बंद कर दिया.        

 

 

 

 

टीवी बंद होते ही राधिका की बेटी मधुरा भी बडबडाते हुए बाहर चली गयी. राधिका सोच में पद गयी . आखिर ऐसा क्यों हो रहा है ? माना की सबके सोचने का तरिका अलग अलग हो सकता है, लेकिन मधुरा के मन में प्यार को लेकर इतना क्रोध. आखिर इसका राज क्या ?अभी उसकी उम्र ही क्या है?      

 

 

 

 

वह अलग बात है की हमारा परिवार खुले विचारों वाला है. जहां हर किसी को अपने विचारों को रखने की आज़ादी है. लेकिन मधुरा के मन में प्रेम को लेकर इनती नफ़रत और वह भी तब जब राधिका और उसके पति विकास की लव मैरिज हुई थी और यह बात हर किसी को पता थी और इसमें हर किसी की स्वीकृति भी थी. इन सब बातों ने राधिका के मन में तूफ़ान खडा कर दिया.        

 

 

 

 

“राधिका” बाहर से विकास की आवाज आई और अचानक से राधिका के मन पर कब्जा जमाकर बैठा  तूफ़ान शांत हुआ…लेकिन तूफ़ान से हुई तबाही राधिका के चेहरे  पर साफ दिखाई दे रही थी. राधिका ने दरवाजा खोला …दरवाजा खुलते ही विकास ने पूछा क्या हुआ…तुम इतनी टेंशन में क्यों हो? अरे कुछ नहीं…आप तो हर बात जान लेते हैं….राधिका ने कहा .    

 

 

 

सच्चे प्रेम की परिभाषा हिंदी कहानी

 

 

 

 

जानू भी कैसे नहीं ….तुम मेरी अर्धांगिनी हो…तुम तक आने वाली हर समस्या का पहला आभास मुझे होता है.यही तो प्यार है…विकास ने राधिका को गले लगाते हुए कहा.      

 

 

 

यही बात तो मधुरा नहीं समझ पा रही है….राधिका ने धीरे से कहा.      

 

 

 

क्या हुआ मधुरा को..क्या नहीं समझ पा रही है वह….विकास थोड़ा चिंतित होते हुए बोला.      

 

 

 

चलिए आप पहले फ्रेश हो जाईये फिर मैं आपको सब बताती हु….और विकास के फ्रेश हो जाने के बाद राधिका ने उसे सब बता दिया.      

 

 

 

अभी बच्ची है वह…यह प्रेम का बंधन  अभी उसे समझ में नहीं आयेगा….विकास ने शान्ति से   कहा.      

 

 

 

नहीं…..अभी वह बच्ची नहीं है…प्रेम के प्रति उसमें जो आवेश था ….वह इस बात का संकेत कर रहा था की जरुर कुछ गलत हुआ है….राधिका ने कहा.         ठीक शाम को हम मधुरा से इस बारे में बात करेंगे….विकास ने कहा.      

 

 

 

शाम समय था….मधुरा अभी बाहर से आई थी…अरे पापा आप आज जल्दी.      

 

 

 

हाँ बेटा …आज थोड़ा काम कम था…ठीक है आप जाओ फ्रेश हो जाओ.        

 

 

 

 

ओके पापा …..मधुरा फ्रेश होकर आ गयी तभी उसकी मां ने एक सिरिअल लगा दिया था और यह कुछ दिन पहले परिवार में सबका फेवरेट सिरिअल था.        

 

 

 

 

लेकिन कुछ दिनों से इसे मधुरा की बगावत झेलनी पड रही थी…जिसका कारण अन्य लोगों की तरह वह भी नहीं समझ पा रहा था..लेकिन उसे इस बात की उम्मीद अवश्य ही थी कि प्यार को कभी भी ठुकराया नहीं जा सकता…प्यार सर्वत्र है.        

 

 

 

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क्या मम्मा फिर से यही सिरिअल  प्रेम का बंधनकोई दूसरा सिरिअल लगाओ.       क्या हुआ बेटा …अभी कुछ दिन पहले तक तो यह आपका फेवरेट था….अचानक से क्या हो गया …..   राधिका  चिढ कर बोली.        

 

 

 

 

ऐसा क्या हो गया बेटा…आपको तो पता है की हमने और राधिका ने प्रेम विवाह किया है.. ….क्या यह गलत है…विकास ने कहा.      

 

 

 

 

 

नहीं…मैंने ऐसा कब कहा ……आप का प्यार तो पावन है….पवित्र है….आप एक दुसरे के पूरक है और प्यार में क्या चाहिए…जब हम एक दुसरे की भावनाओं.        

 

 

 

 

 

उसकी सोच….उसके सुख दुःख   को स्वीकार कर लेते हैं ….उसमें कोई घमंड नहीं रह जाता है …यही तो प्यार है.लेकिन….       लेकिन क्या बेटा? राधिका ने कहा.    

 

 

 

 

 लेकिन जब यह ना होकर प्यार केवल शारिरिक  रह जाए तो वह अपवित्र हो जाता है…..और यही मेरी सहेली तृप्ति के साथ हुआ….आज वह बर्बाद हो चुकी है….तभी से मुझे प्यार से  नफ़रत हो गयी है……मधुरा की आँखे भर आई थी.      

 

 

 

 

राधिका ने उसे गले लगा लिया…..कहा की सच है….इन जैसे राक्षसों की वजह से ही प्यार से विश्वास उठता  जा रहा है……लेकिन   प्रेम वह हीरा है जो अपनी चमक दिखा देता है.      

 

 

 

 

लेकिन जौहरी की परख होनी चाहिए….प्रेम पर अंधविश्वास घातक होता है….इसीलिए प्रेम का बंधन बांधने से पहले यह अवश्य ही जान लेना चाहिए की वह शख्श कितना काबिल है…वह  प्रेम का बंधनकहाँ तक निभा सकता है. …..अब मधुरा की सारी गलतफहमी दूर हो गयी थी.    

 

 

 

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 2- प्यार का तोहफा :- वह भी क्या दिन थे जब  मैं सुबह जल्द उठ कर तैयार होकर कालेज की ओर    हो जाता था. लेकिन जाने से पहली मुझे कालेज जाने की फ़िक्र कम खुद के हैंडसम दिखने की फ़िक्र ज्यादा ही रहती थी.        

 

 

 

 

मैं अपने कपड़ों, अपने हेयर  स्टाइल , शूज पर   कुछ ज्यादा ही ध्यान   देता था. इसके अलावा कालेज जाने से पहले मैं कम से कम १० बार अपने चहरे को देखता था.        

 

 

 

लेकिन यह सभी आदते पहले से नहीं थी. यह बदलाव बहुत जल्द हुए थी और इन बदलाव को देखकर मेरे घर के अन्य सदस्य भी हैरान थे. क्योकि इसके पहले जो भी कुछ था वह इसके ठीक विपरीत था…अर्थात मैं उन कपड़ों में भी कालेज चला जाता था जिसमें कोई नुक्कड़  पर जाना पसंद ना करे.      

 

 

 

 

इन बदलाव से घर के सदस्य भी काफी खुश थे , लेकिन वे इस बात से कुछ ज्यादा ही खुश थे कि अब मैं पढाई में भी कुछ ज्यादा ही ध्यान देने लगा  था. लेकिन इन सभी बदलाव का राज क्या था यह किसी  पता नहीं था. चलिए अब देर क्यों आपको तो बता ही देते हैं.        

 

 

 

 

इन सभी बदलाव का कारण थी एक लड़की. दोस्तों क्या बताऊ, शायद मैंने पिछले जन्म में कुछ ज्यादा ही पुण्य किये थे जो मुझे ऋतू मिली. जी हाँ उस लड़की का नाम ऋतू मेहरा था.      

 

 

 

 

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बला की खुबसूरत थी वह….उसके आगे तो बड़ी बड़ी हिरोइन भी शर्मा जाए…..वह मेरी हिरोइन थी और मैं उसका हीरो. मैं सुबह जल्द तैयार होकर नुक्कड़ पर पहुंचता और वह वही खड़ी रहती या फिर कभी मुझे थोड़ा इन्तजार करना पड़ता….फिर हम साथ में कालेज जाते.        

 

 

 

 

रास्ते में ढेर सारी बाते होती…मैं तो बस उसके ही ख्यालों में खोया रहता था. उसके प्रेम में मैं पागल हो गया था. मैं भगवान से कहता प्रभु आपको लाख लाख प्रणाम जो आपने मुझे यहप्यार का तोहफा दिया.      

 

 

 

 

 

जिससे  मेरे अन्दर यह बदलाव आया और  मैं कुछ बनने के लिए मेहनत करने   लगा. सचमुच अगर किसी से प्यार  होता है तो किसी और के ना सही तो कम से कम उसकी नज़रों में जरुर अच्छा बनने की कोशिश करते हैं और एक काबिल इंसान बन जाते हैं , मित्रों जीवन में प्यार का एहसास होना जरुरी  है. जब आप प्यार में पड़ते हैं तब आप इस खुबसूरत एहसास को समझ पाते हैं.        

 

 

 

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3-  Short Love Story In Hindi   बाहों का हार:- दोस्तों मैं अनीता आज अपने प्यार की सच्ची कहानी को आप लोगों के बीच रख रही हूँ. मैं हमेशा चाहती थी कि मेरा पति एक आदर्श पति हो, जिम्मेदार हो, मेरी हर ख्वाहिस को पूरी करे.      

 

 

 

 

प्यार के मामले में बिलकुल सच्चा हो और यह सिर्फ मेरी ही नहीं बल्कि हर लड़की की सोच होती है. कोई भी लड़की यह कभी भी नहीं चाहेगी कि उसका पति निकम्मा हो.      

 

 

 

 

मैं भी उन्हीं में से एक  थी और मैं भगवान  की  शुक्रगुजार हूँ कि उन्होने मेरी बात सुन ली और मुझे एक अच्छा और सच्चा पति मिला. जो मुझे बेहद प्यार करते हैं. मेरी हर सुबह उनकी मुस्कान के साथ होती है.        

 

 

 

 

मैं आज भी उस पल को याद करते हुए प्यार के गहरे सागर में डूब जाती हूँ , जब मैं उनसे पहली बार मिली. मैं और मेरी सहेली एक बस में यात्रा कर रहे थे. ट्रेन में बहुत भीड़ थी.        

 

 

 

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मैं बीच में फंसी हुई थी.जैसे ही मेरी सहेली ने  धूप से बचने के लिए खिड़की बंद की. वैसे ही वो मेरे तरफ देखकर मुस्कुराया…..वैसे तो मैं अनजान लोगों की तरफ देखना भी पसंद नहीं करती  हूँ, लेकिन उसकी  उस मुस्कान में ना जाने क्या आकर्षण था कि मैंने भी मुस्कुरा दिया.        

 

 

 

 

इसके बाद बातों का सिलसिला शुरू हो गया और कुछ ही समय में हम घुल मिल गए.  कुछ देर में हमारा स्टॉप आ गया. मैंने उसे बाय कहा….फोन नम्बर्स का आदान-प्रदान पहले ही हो चुका था.        

 

 

 

 

 

बस से उतरते ही मेरी सहेली ने इठलाते हुए  कहा ” क्या बात है अनीता जी….अरे उस बस में तो हम भी थे…हमसे तो ना बातें हुई…सारी बातें तो उन मिस्टर से ही हो गयीं ”        

 

 

 

 

यह बात मुझे लग गयी. मैंने भी सोच लिया कि मैं उन्हें फोन नहीं करुँगी…..तीन दिन बाद उनका फोन आया…..लेकिन वे तीन दिन ३०० साल के बराबर थे….हर पर मेरी निगाह मोबाइल पर ही रहती थी.    

 

 

 

 

  कोई भी फोन आने पर मैं झट से फोन देखती कि कहीं उनका ही तो नहीं है. खैर फोन पर सारे गिले सिकवे दूर हो गए…..अब तो फोन का आना-जाना शुरू हो गया….मैंने कभी भी नहीं सोचा था कि यूँ ही सफ़र के दौरान इतने अच्छे इंसान से मुलाक़ात हो जायेगी.      

 

 

 

 

ओ अक्सर मुझसे कहता है कि तुमको तो भरा पूरा परिवार मिला था लेकिन मुझे  ज़िन्दगी ने  कभी अपनी  ख़ुशी की रोशनी से रौशन नहीं किया था.       

 

 

 

 

मेरे  पिता की मृत्यु बहुत  जल्द हो गयी थी. उसके बाद  मां भी अक्सर बीमार ही रहती थी. तुमने जो यह बाहों का हार मेरे गले में डाला है न…..मैं समझता हूं कि भगवान ने सारी खुशियाँ मुझे सूद समेत वापस दे दी हैं.        

 

 

 

 

 

आज हमारी शादी हो चुकी है, लेकिन मेंजब भी उस सफ़र को याद कराती हूँ…..प्रेम के गहरे सागर में डूब जाती हूँ.          

 

 

 

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