english stories for kids

hindi moral story for child ७ मोरल कहानियां

hindi moral story for child
Written by MoralAbhi

hindi moral story for child शहर से दूर जंगल में एक पेड़ पर गोरैया का जोड़ा रहता था. उनके नाम थे, चीकू और चिनमिन. दोनो बहुत खुश रहते थे. सुबह सवेरे दोनो दाना चुगने के लिये निकल जाते. शाम होने पर अपने घोंसले मे लौट जाते.

 

कुछ समय बाद चिनमिन ने अंडे दिये. चीकू और चिनमिन की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. दोनों ही बड़ी बेसब्री से अपने बच्चों के अंडों से बाहर निकलने का इंतजार करने लगे. अब चिनमिन अंडों को सेती थी और चीकू अकेला ही दाना चुनने के लिये जाता था.

 

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एक दिन एक हाथी धूप से बचने के लिये पेड़ के नीचे आ बैठा. मदमस्त हो कर वह अपनी सूँड़ से उस पेड़ को हिलाने लगा. हिलाने से पेड़ की वह डाली टूट गयी, जिस पर चीकू और चिनमिन का घोंसला था. इस तरह घोंसले में रखे अंडे टूट गये.

अपने टूटे अंडों को देख कर चिनमिन जोरों से रोने लगी. उसके रोने की आवाज सुन कर, चीकू और चिनमिन का दोस्त भोलू — उसके पास आये और रोने का कारण पूछने लगे.

चिनमिन से सारी बात सुनकर उन्हें बहुत दुख हुआ. फिर दोनो को धीरज बँधाते हुए भोलू — बोला, “अब रोने से क्या फायदा, जो होना था सो हो चुका.”

चीकू बोला, “भोलू भाई, बात तो तुम ठीक कर रहे हो, परंतु इस दुष्ट हाथी ने घमंड में आ कर हमारे बच्चों की जान ले ली है. इसको तो इसका दंड मिलना ही चाहिये. यदि तुम हमारे सच्चे दोस्त हो तो उसको मारने में हमारी मदद करो.”

यह सुनकर थोड़ी देर के लिये तो भोलू दुविधा में पड़ गया कि कहाँ हम छोटे छोटे पक्षी और कहाँ वह विशालकाय जानवर. परंतु फिर बोला, “चीकू दोस्त, तुम सच कह रहे हो.

 

इस हाथी को सबक सिखाना ही होगा. अब तुम मेरी अक्ल का कमाल देखो. मैं अपनी दोस्त वीना मक्खी को बुला कर लाता हूँ. इस काम में वह हमारी मदद करेगी.” और इतना कह कर वह चला गया.

भोलू ने अपनी दोस्त वीना के पास पहुँच कर उसे सारी बात बता दी.  फिर उसने उससे हाथी को मारने का उपाय पूछा.  वीना बोली, “इससे पहले की हम कोई फैसला करे, अपने मित्र मेघनाद मेंढ़क की भी सलाह ले लूँ तो अच्छा रहेगा. वह बहुत अक्लमंद है. हाथी को मारने के लिये जरूर कोई आसान तरीका बता देगा.

चीकू, भोलू और वीना, तीनों मेघनाद मेंढ़क के पास गये. सारी बात सुन कर मेघनाद बोला, “मेरे दिमाग में उसे मारने की एक बहुत ही आसान तरकीब आयी है.

वीना बहन सबसे पहले दोपहर के समय तुम हाथी के पास जा कर मधूर स्वर में एक कान में गुंजन करना. उसे सुन कर वह आनंद से अपनी आँखे बंद कर लेगा. उसी समय भोलू अपनी तीखी चोंच से उसकी दोनो आँखें फोड़ देगा. इस प्रकार अंधा हो कर वह इधर-उधर भटकेगा.

थोड़ी देर बाद उसको प्यास लगेगी तब मैं खाई के पास जा कर अपने परिवार सहित जोर-जोर से टर्-टर् की आवाज करने लगूँगा. हाथी समझेगा की यह आवाज तालाब से आ रही है. वह आवाज की तरफ बढ़ते बढ़ते खाई के पास आयेगा और उसमें जा गिरेगा और खाई में पड़ा पड़ा ही मर जाएगा.

सबको मेघनाद की सलाह बहुत पसंद आयी. जैसा उसने कहा था, वीना और भोलू ने वैसा ही किया. इस तरह छोटे छोटे जीवों ने मिल कर अपनी अक्ल से हाथी जैसे बड़े जीव को मार गिराया और फिर से प्यार से रहने लगे.

 

 

hindi moral story for child चालाकी का फल 

 

एक थी बुढ़िया, बेहद बूढ़ी पूरे नब्बे साल की.  एक तो बेचारी को ठीक से दिखाई नहीं पड़ता था ऊपर से उसकी मुर्गियाँ चराने वाली लड़की नौकरी छोड़ कर भाग गयी.

बेचारी बुढ़िया! सुबह मुर्गियों को चराने के लिये खोलती तो वे पंख फड़फड़ाती हुई सारी की सारी बुढिया के घर की चारदीवारी फाँद कर अड़ोस पड़ोस के घरों में भाग जातीं और ‘कों कों कुड़कुड़’ करती हुई सारे मोहल्ले में हल्ला मचाती हुई घूमतीं .

 

कभी वे पड़ोसियों की सब्जियाँ खा जातीं तो कभी पड़ोसी काट कर उन्हीं की सब्जी बना डालते.  दोनों ही हालतों में नुकसान बेचारी बुढ़िया का होता. जिसकी सब्जी बरबाद होती वह बुढ़िया को भला बुरा कहता और जिसके घर में मुर्गी पकती उससे बुढ़िया की हमेशा की दुश्मनी हो जाती.

 

हार कर बुढ़िया ने सोचा कि बिना नौकर के मुर्गियाँ पालना उसकी जैसी कमज़ोर बुढ़िया के बस की बात नहीं.  भला वो कहाँ तक डंडा लेकर एक एक मुर्गी हाँकती फिरे? ज़रा सा काम करने में ही तो उसका दम फूल जाता था .और बुढ़िया निकल पड़ी लाठी टेकती नौकर की तलाश में.

पहले तो उसने अपनी पुरानी मुर्गियाँ चराने वाली लड़की को ढूँढा. लेकिन उसका कहीं पता नहीं लगा.  यहाँ तक कि उसके माँ बाप को भी नहीं मालूम था कि लड़की आखिर गयी तो गयी कहाँ? “नालायक और दुष्ट लड़की! कहीं ऐसे भी भागा जाता है? न अता न पता सबको परेशान कर के रख दिया.” बुढ़िया बड़बड़ायी और आगे बढ़ गयी.

थोड़ी दूर पर एक भालू ने बुढ़िया को बड़बड़ाते हुए सुना तो वह घूम कर सड़क पर आ गया और बुढ़िया को रोक कर बोला, ” गु र्र र , बुढ़िया नानी नमस्कार! आज सुबह सुबह कहाँ जा रही हो? सुना है तुम्हारी मुर्गियाँ चराने वाली लड़की नौकरी छोड़ कर भाग गयी है. न हो तो मुझे ही नौकर रख लो. खूब देखभाल करूँगा तुम्हारी मुर्गियों की.”

“अरे हट्टो, तुम भी क्या बात करते हो? बुढ़िया ने खिसिया कर उत्तर दिया, ” एक तो निरे काले मोटे बदसूरत हो मुर्गियाँ तो तुम्हारी सूरत देखते ही भाग खड़ी होंगी. फिर तुम्हारी बेसुरी आवाज़ उनके कानों में पड़ी तो वे मुड़कर दड़बे की ओर आएँगी भी नहीं.

 

एक तो मुर्गियों के कारण मुहल्ले भर से मेरी दुश्मनी हो गयी है, दूसरा तुम्हारे जैसा जंगली जानवर और पाल लूँ तो मेरा जीना भी मुश्किल हो जाए. छोड़ो मेरा रास्ता मैं खुद ही ढूँढ लूँगी अपने काम की नौकरानी.”

बुढ़िया आगे बढ़ी तो थोड़ी ही दूर पर एक सियार मिला और बोला, “हुआँ हुआँ राम राम बुढ़िया नानी किसे खोज रही हो? बुढ़िया खिसिया कर बोली, अरे खोज रहीं हूँ एक भली सी नौकरानी जो मेरी मुर्गियों की देखभाल कर सके.

 

देखो भला मेरी पुरानी नौकरानी इतनी दुष्ट छोरी निकली कि बिना बताए कहीं भाग गयी अब मैं मुर्गियों की देखभाल कैसे करूँ? कोई कायदे की लड़की बताओ जो सौ तक गिनती गिन सके ताकि मेरी सौ मुर्गियों को गिन कर दड़बे में बन्द कर सकें.”

यह सुन कर सियार बोला, “हुआँ हुआँ, बुढ़िया नानी ये कौन सी बड़ी बात है? चलो अभी मैं तुम्हें एक लड़की से मिलवाता हूँ. मेरे पड़ोस में ही रहती है. रोज़ जंगल के स्कूल में पढ़ने जाती है इस लिये सौ तक गिनती उसे जरूर आती होगी. अकल भी उसकी खूब अच्छी है. शेर की मौसी है वो, आओ तुम्हें मिलवा ही दूँ उससे.

बुढ़िया लड़की की तारीफ सुन कर बड़ी खुश होकर बोली, “जुग जुग जियो बेटा, जल्दी बुलाओ उसे कामकाज समझा दूँ. अब मेरा सारा झंझट दूर हो जाएगा. लड़की मुर्गियों की देखभाल करेगी और मैं आराम से बैठकर मक्खन बिलोया करूँगी.”

सियार भाग कर गया और अपने पड़ोस में रहने वाली चालाक पूसी बिल्ली को साथ लेकर लौटा. पूसी बिल्ली बुढ़िया को देखते ही बोली, “म्याऊँ, बुढ़िया नानी नमस्ते. मैं कैसी रहूँगी तुम्हारी नौकरानी के काम के लिये?”

 

नौकरानी के लिये लड़की जगह बिल्ली को देखकर बुढ़िया चौंक गयी. बिगड़ कर बोली, “हे भगवान कहीं जानवर भी घरों में नौकर हुआ करते हैं? तुम्हें तो अपना काम भी सलीके से करना नहीं आता होगा. तुम मेरा काम क्या करोगी?”

लेकिन पूसी बिल्ली बड़ी चालाक थी. आवाज को मीठी बना कर मुस्कुरा कर बोली, “अरे बुढ़िया नानी तुम तो बेकार ही परेशान होती हो. कोई खाना पकाने का काम तो है नहीं जो मैं न कर सकूं . आखिर मुर्गियों की ही देखभाल करनी है न?

 

वो तो मैं खूब अच्छी तरह कर लेती हूँ. मेरी माँ ने तो खुद ही मुर्गियाँ पाल रखी हैं. पूरी सौ हैं. गिनकर मैं ही चराती हूँ और मैं ही गिनकर बन्द करती हूँ. विश्वास न हो तो मेरे घर चलकर देख लो.”

एक तो पूसी बिल्ली बड़ी अच्छी तरह बात कर रही थी और दूसरे बुढ़िया काफी थक भी गयी थी इसलिये उसने ज्यादा बहस नहीं की और पूसी बिल्ली को नौकरी पर रख लिया.

पूसी बिल्ली ने पहले दिन मुर्गियों को दड़बे में से निकाला और खूब भाग दौड़ कर पड़ोस में जाने से रोका. बुढ़िया पूसी बिल्ली की इस भाग-दौड़ से संतुष्ट होकर घर के भीतर आराम करने चली गयी. कई दिनों से दौड़ते भागते बेचारी काफी थक गयी थी तो उसे नींद भी आ गयी.

इधर पूसी बिल्ली ने मौका देखकर पहले ही दिन छे मुर्गियों को मारा और चट कर गयी. बुढ़िया जब शाम को जागी तो उसे पूसी की इस हरकत का कुछ भी पता न लगा. एक तो उसे ठीक से दिखाई नहीं देता था और उसे सौ तक गिनती भी नहीं आती थी. फिर भला वह इतनी चालाक पूसी बिल्ली की शरारत कैसे जान पाती?

अपनी मीठी मीठी बातोंसे बुढ़िया को खुश रखती और आराम से मुर्गियाँ चट करती जाती.  पड़ोसियों से अब बुढ़िया की लड़ाई नहीं होती थी क्योंकि मुर्गियाँ अब उनके आहाते में घुस कर शोरगुल नहीं करती थीं.  बुढ़िया को पूसी बिल्ली पर इतना विश्वास हो गया कि उसने मुर्गियों के दड़बे की तरफ जाना छोड़ दिया.

धीरे धीरे एक दिन ऐसा आया जब दड़बे में बीस पच्चीस मुर्गियाँ ही बचीं.  उसी समय बुढ़िया भी टहलती हुई उधर ही आ निकली. इतनी क़म मुर्गियाँ देखकर उसने पूसी बिल्ली से पूछा, “क्यों री पूसी, बाकी मुर्गियों को तूने चरने के लिये कहाँ भेज दिया?”

 

पूसी बिल्ली ने झट से बात बनाई, ” अरे और कहाँ भेजूंगी  बुढ़िया नानी. सब पहाड़ के ऊपर चली गयी हैं. मैंने बहुत बुलाया लेकिन वे इतनी शरारती हैं कि वापस आती ही नहीं.”

“ओफ् ओफ् ! ये शरारती मुर्गियाँ.” बुढ़िया का बड़बड़ाना फिर शुरू हो गया, “अभी जाकर देखती हूँ कि ये इतनी ढीठ कैसे हो गयी हैं? पहाड़ के ऊपर खुले में घूम रही हैं. कहीं कोई शेर या भेड़िया आ ले गया तो बस!”

ऊपर पहुँच कर बुढ़िया को मुर्गियाँ तो नहीं मिलीं. मिलीं सिर्फ उनकी हडि्डयाँ और पंखों का ढ़ेर! बुढ़िया को समझते देर न लगी कि यह सारी करतूत पूसी बिल्ली की है. वो तेजी से नीचे घर की ओर लौटी.

इधर पूसी बिल्ली ने सोचा कि बुढ़िया तो पहाड़ पर गयी अब वहाँ सिर पकड़ कर रोएगी जल्दी आएगी नहीं. तब तक क्यों न मैं बची-बचाई मुर्गियाँ भी चट कर लूँ? यह सोच कर उसने बाकी मुर्गियों को भी मार डाला. अभी वह बैठी उन्हें खा ही रही थी कि बुढ़िया वापस लौट आई.

पूसी बिल्ली को मुर्गियाँ खाते देखकर वह गुस्से से आग बबूला हो गयी और उसने पास पड़ी कोयलों की टोकरी उठा कर पूसी के सिर पर दे मारी. पूसी बिल्ली को चोट तो लगी ही, उसका चमकीला सफेद रंग भी काला हो गया. अपनी बदसूरती को देखकर वह रोने लगी.

आज भी लोग इस घटना को नही भूले हैं और रोती हुई काली बिल्ली को डंडा लेकर भगाते हैं. चालाकी का उपयोग बुरे कामों में करने वालों को पूसी बिल्ली जैसा फल भोगना पड़ता है.

 

hindi  story for child with moral     Story – 3 धूर्त भेड़िया

 

ब्रह्मारण्य नामक एक बन था. उसमें कर्पूरतिलक नाम का एक बलशाली हाथी रहता था. देह में और शक्ति में सबसे बड़ा होने से बन में उसका बहुत रौब था. उसे देख सारे बाकी पशु प्राणी उससे दूर ही रहते थे.

जब भी कर्पूरतिलक भूखा होता तो अपनी सूँड़ से पेड़ की टहनी आराम से तोड़ता और पत्ते मज़े में खा लेता. तालाब के पास जा कर पानी पीता और पानी में बैठा रहता.

 

एक तरह से वह उस वन का राजा ही था. कहे बिना सब पर उसका रौब था. वैसे ना वह किसी को परेशान करता था ना किसी के काम में दखल देता था फिर भी कुछ जानवर उससे जलते थे.

जंगल के भेड़ियों को यह बात अच्छी नहीं लगती थी. उन सब ने मिलकर सोचा, “किसी तरह इस हाथी को सबक सिखाना चाहिये और इसे अपने रास्ते से हटा देना चाहिये.

 

उसका इतना बड़ा शरीर है, उसे मार कर उसका मांस भी हम काफी दिनों तक खा सकते हैं. लेकिन इतने बड़े हाथी को मारना कोई बच्चों का खेल नहीं. किसमें है यह हिम्मत जो इस हाथी को मार सके?”

उनमें से एक भेड़िया अपनी गर्दन ऊँची करके कहने लगा, “उससे लड़ाई करके तो मैं उसे नहीं मार सकता लेकिन मेरी बुद्धिमत्ता से मैं उसे जरूर मारने में कामयाब हो सकता हूँ.” जब यह बात बाकी भेड़ियों ने सुनी तो सब खुश हो गये. और सबने उसे अपनी करामत दिखाने की इज़ाज़त दे दी.

चतुर भेड़िया हाथी कर्पूरतिलक के पास गया और उसे प्रणाम किया. “प्रणाम! आपकी कृपा हम पर सदा बनाए रखिये.”

कर्पूरतिलक ने पूछा, “कौन हो भाई तुम? कहाँ से आये हो? मैं तो तुम्हें नहीं जानता. मेरे पास किस काम से आये हो?”

“महाराज! मैं एक भेड़िया हूँ. मुझे जंगल के सारे प्राणियों ने आपके पास भेजा है. जंगल का राजा ही सबकी देखभाल करता है, उसीसे जंगल की शान होती है. लेकिन अफसोस की बात यह है कि अपने जंगल में कोई राजा ही नहीं.

 

हम सब ने मिलकर सोचा कि आप जैसे बलवान को ही जंगल का राजा बनाना चाहिये.  इसलिये राज्याभिषेक का मुहुर्त हमने निकाला है. यदि आपको कोई आपत्ति नहीं हो तो आप मेरे साथ चल सकते हैं और हमारे जंगल के राजा बन सकते हैं.”

ऐसी राजा बनने की बात सुनकर किसे खुशी नहीं होगी? कर्पूरतिलक भी खुश हो गया. अभी थोड़ी देर पहले तो मैं कुछ भी नहीं था और एकदम राजा बन जाऊँगा यह सोचकर उसने तुरन्त हामी भर दी. दोनो चल पडे. भेड़िया कहने लगा, “मुहुर्त का समय नज़दीक आ रहा है, जरा जल्दी चलना होगा हमें.”

भेड़िया जोर जोर से भागने लगा और उसके पीछे कर्पूरतिलक भी जैसे बन पड़े, भागने की केाशिश में लगा रहा. बीच में एक तालाब आया. उस तालाब में ऊपर ऊपर तो पानी दिखता था. लेकिन नीचे काफी दलदल था. भेड़िया छोटा होने के कारण कूद कर तालाब को पार कर गया और पीछे मुड़कर देखने लगा कि कर्पूरतिलक कहाँ तक पहुँचा है.

कर्पूरतिलक अपना भारी शरीर लेकर जैसे ही तालाब में जाने लगा तो दलदल में फंसता ही चला गया. निकल न पाने के कारण में वह भेड़िये को आवाज़ लगा रहा था, “अरे! दोस्त, मुझे जरा मदद करोगे? मैं इस दलदल से निकल नहीं पा रहा हूँ.”

लेकिन भेड़िये का ज़वाब तो अलग ही आया, “अरे! मूर्ख हाथी, मुझ जैसे भेड़िये पर तुमने यकीन तो किया लेकिन अब भुगतो और अपनी मौत की घड़ियाँ गिनते रहो, मैं तो चला!” यह कहकर भेड़िया खुशी से अपने साथियों को यह खुशखबरी देने के लिये दौड़ पड़ा.
इसीलिये कहा गया है कि एकदम से किसी पर यकीन ना करने में ही भलाई होती है.

 

    hindi moral story for child  कहानी ४ गड़ा हुआ धन 

 

बहुत पुरानी बात है.  किसी देश में एक बूढा व्यक्ति रहता था.  वह काफी मेहनती था.  खेतों में काम करके अपना गुजारा करता था. उसके तीन लड़के थे जो बड़े ही आलसी थे.

 

उसकी आलस्य की वजह से बूढा और उसकी पत्नी काफी परेशान रहते थे.  दोनों अपने लड़कों को समझने की कोशिश करते लेकिन तीनों अपने आलसीपन से बाज नहीं आए।.

 

एक दिन बूढा किसान चल बसा. बुढिया ने अपने बेटों को खेत पर जाने के लिए कहा, लेकिन वे गए नहीं. जब तक अनाज था बुढिया ने उनको बना –बना कर खिलाया आखिर में एक दिन घर का सारा अनाज ख़त्म हो गया. जब घर में एक भी दाना नहीं बचा तो बुढिया ने अपनों बेटों से काम धंधे के लिए कहा लेकिन वे तब भी नहीं गए.

एक दिन सुबह बुढिया उठ कर रोने लगी. माँ को रोते देखकर उसके बेटों ने पूछा तो माँ ने बताया, “सपने में तुम्हारे पिता आए थे. उन्होंने बताया की यदि तुम लोग खेत में से गढ़ा हुआ धन निकल कर ले आओ तो हमारी गरीबी दूर हो सकती है.”

“तो इसमें रोने की बात क्या है” लड़कों ने पूछा.

बुढिया बोलो, “मै तो यह सोच कर रो रही हूँ कि अब खेत खोद कर कौन धन निकल कर लायेगा? किसी दूसरे से कह भी नहीं सकती हूँ, इसीलिए रो रही हूँ.”

बुढिया की बात सुनकर तीनों बेटे खेत में जाकर जमीन खोदने लगे.  तीनो बेटे एक ही जगह खुदाई कर रहे थे यह देखकर बुढिया ने कहा, “ धन खेत में कहीं भी हो सकता है इसलिए पूरे खेत की अच्छे से खुदाई करो. “पूरा खेत खुद जाने के बाद जब धन नहीं मिला तो तीनों बेटे नाराज हो गए. बुढिया ने कहा,” ठीक है सपने में तुम्हारे पिता आने पर मै उनसे इसकी शिकायत करूगी. जब खेत की खुदाई हो गई है तो क्यों न इसमें अनाज बो दिया जाए.”

बेटों ने अनाज बो दिया. कुछ ही दिनों में खेत में फसल लहराने लगी. फसल काटने का वक्त आया तो एक दिन बुढिया फिर रोने लगी. बेटों ने पूछा, ”अब क्या हुआ ?

“तेरे पिता सपने में आये थे कहने लगे फसल को काट कर बाज़ार में बेच कर आओ, तब उन्हें धन के बारे में बताएँगे.”

बेटों ने धन के लालच में फसल काटकर बाज़ार में बेचने गए. फसल बेचने पर जब उन्हें धन मिला तो तीनों बेटे बहुत खुश हुए. उस दिन से तीनों ने आलस्य त्याग कर खेत में कम करने लगे.

यदि आप अमीर बनना चाहते हैं या अपने जीवन में सफल होना चाहते हैं तो आलस्य से बचें. आलस्य गरीबी है, आलस्य असफलता है, आलस्य नाकामयाबी है, आलस्य अमीरी का दुश्मन है. आलस्य को दूर भगाएं और सफल व्यक्ति बन जाएँ. सफल बनना है तो आलस्य को त्यागना होगा. आलस्य से जीवन के रचनात्मक पल नष्ट हो जाते हैं.

 

hindi moral story for child  कहानी – ५  चार मुर्ख 

 

एक बार काशी नरेश ने अपने मंत्री को यह आदेश दिया कि जाओ और तीन दिन के भीतर चार मूर्खों को मेरे सामने पेश करो. यदि तुम ऐसा नहीं कर सके तो तुम्हारा सिर कलम कर दिया जाएगा.

पहले तो मंत्री जी थोड़े से घबराये लेकिन मरता क्या न करता. राजा का हुक्म जो था। ईश्वर का स्मरण कर मूर्खों की खोज में चल पड़े.

कुछ मील चलने के बाद उसने एक आदमी को देखा जो गदहे पर सवार था और सिर पर एक बड़ी सी गठरी उठाये हुए था. मंत्री को पहला मूर्ख मिल चुका था. मंत्री ने चैन की सांस ली.

कुछ और आगे बढ़ने पर दूसरा मूर्ख भी मिल गया.  वह लोगों को लड्डू बाँट रहा था. पूछने पर पता चला कि उसकी बीवी शत्रु के साथ भाग गयी और अब  उसकी बीबी ने एक बेटे को जन्म दिया था जिसकी ख़ुशी में वह लड्डू बाँट रहा था.

दोनों मूर्खों को लेकर मंत्री राजा के पास पहुंचा.

राजा ने पूछा – ये तो दो ही हैं? तीसरा मूर्ख कहाँ है?

महाराज वह मैं हूँ. जो बिना सोचे समझे मूर्खों की खोज में निकल पड़ा. बिना कुछ सोचे समझे आपका हुक्म बजाने चल पड़ा.

और चौथा मूर्ख ?

क्षमा करें महाराज? वह आप हैं . जनता की भलाई और राज काज के काम के बदले आप मूर्खों की खोज को इतना जरुरी काम मानते हैं.

राजा की आँखें खुल गयी और उनसे मंत्री से क्षमा मांगी.

 

  moral story for child in hindi story – 6 कौवा और मोर 

 

एक दिन कौए ने जंगल में मोरों की बहुत- सी पूंछें बिखरी पड़ी देखीं. वह अत्यंत प्रसन्न होकर कहने लगा- वाह भगवान! बड़ी कृपा की आपने, जो मेरी पुकार सुन ली.

 

मैं अभी इन पूंछों से अच्छा खासा मोर बन जाता हूं. इसके बाद कौए ने मोरों की पूंछें अपनी पूंछ के आसपास लगा ली. फिर वह नया रूप देखकर बोला- अब तो मैं मोरों से भी सुंदर हो गया हूं.

 

अब उन्हीं के पास चलकर उनके साथ आनंद मनाता हूं. वह बड़े अभिमान से मोरों के सामने पहुंचा. उसे देखते ही मोरों ने ठहाका लगाया. एक मोर ने कहा- जरा देखो इस दुष्ट कौए को. यह हमारी फेंकी हुई पूंछें लगाकर मोर बनने चला है. लगाओ बदमाश को चोंचों व पंजों से कस-कसकर ठोकरें. यह सुनते ही सभी मोर कौए पर टूट पड़े और मार-मारकर उसे अधमरा कर दिया.

कौआ भागा-भागा अन्य कौए के पास जाकर मोरों की शिकायत करने लगा तो एक बुजुर्ग कौआ बोला- सुनते हो इस अधम की बातें. यह हमारा उपहास करता था और मोर बनने के लिए बावला रहता था.

 

इसे इतना भी ज्ञान नहीं कि जो प्राणी अपनी जाति से संतुष्ट नहीं रहता, वह हर जगह अपमान पाता है. आज यह मोरों से पिटने के बाद हमसे मिलने आया है. लगाओ इस धोखेबाज को.इतना सुनते ही सभी कौओं ने मिलकर उसकी अच्छी धुलाई की.

कहानी का सन्देश यह है कि ईश्वर ने हमें जिस रूप और आकार में बनाया है, हमें उसी में संतुष्ट रहकर अपने कर्मो पर ध्यान देना चाहिए. कर्म ही महानता का द्वार खोलता है.

 

    hindi moral story for child  कहानी -७  दाता 

 

राजपुर नगर में दो व्यक्ति शामू और झामु रहते थे.  दोनों ही थोड़े आलसी थे और भाग्य पर विश्वास करते थे.  शामू कहता – यदि राजा विक्रम सिंह मुझे कुछ देता है तो गुजारा हो जाता है अन्यथा मेरे पास कुछ भी नहीं है.

 

झामु कहता – भगवान भोलेनाथ मुझे कुछ देते हैं तो मेरा गुजारा हो जाता है नहीं तो मेरे पास तो कुछ भी नहीं. एक दिन राजा ने दोनों को बुलाया और यह बातें उनके मुंह से सुनी.

राजा विक्रम सिंह ने एक गोल कद्दू मंगाया और उसके बीज निकाल कर शामू को दे दिया जिसका मानना था कि राजा ही उसे जो कुछ देता है उसी से उसका गुजारा होता है.  राजा को भी लगने लगा कि सच में वही दाता है.

शामू उस कद्दू को पाकर बड़ा खुश हुआ और बाजार में जाकर उसे चार पैसे में बेच आया.  थोड़ी देर बाद उधर से झामु गुजरा जो सोचता था कि भगवान् शिव ही उसे जो कुछ देते हैं उसी से उसका गुजारा होता है. झामु ने वह कद्दू छह पैसे में खरीद ली.

कद्दू लाकर जब उसे सब्जी बनाने के लिए काटा तो पैसों की बारिश होने लगी. उसे बड़ा आश्चर्य हुआ. बात राजा तक पहुंची.राजा का घमंड टूट चुका था. सारी बातें जानने के बाद उसने कहा – भगवान् ही असली दाता हैं. उनसे बड़ा कोई नहीं. उसे इसका बोध हो चुका था.

 

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